काही हायकू

आपण चांगलं
तर जग चांगलं
आता समजलं
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कशाला उगाच
खोटं बोलायचं
खरं वागायचं
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भेट मला
एकदा निवांत
जिथे एकांत
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भेट तुझी
कधी   होणार
तुझा  नकार
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कसं सांगू तुला
काय वाटतंय
कुठं उमगतंय
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कोण म्हणतं
मी हरलो
जरा थांबलो
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उमगले ते
कोडे जे
मला पडले होते
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उगाच येथे
थांबू नकोस
जा तेथे
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राहील मी
तुझ्या शिवाय
नाही पर्याय
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 गेला शीण
तुला पाहून
उतरला  ताण
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 महेश भा रायखेलकर


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